Rani Padmini History in Hindi | रानी पद्मिनी का इतिहास

Rani Padmini History In Hindi

Rani Padmini History in Hindi / Rani Padmini रानी पद्मिनी (पद्मावती – Padmavati) का इतिहास History –  राजस्थान के चित्तौड़गढ़ के राजा रत्नसिंह (रतनसेन) [1302-1303 ई०] की रानी थी।इस राजपूत रानी के नाम का ऐतिहासिक अस्तित्व बहुत संदिग्ध है,[1]और वैसे ऐसा कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है कि रानी पद्मिनी वास्तव में अस्तित्व में थी या नहीं. पद्मावत एक कविता थी। जो की  मलिक मुहम्मद जायसी कृत ‘पद्मावत‘ नामक महाकाव्य है।अन्य जिस किसी ऐतिहासिक स्रोतों या ग्रंथों में ‘पद्मावती’ या ‘पद्मिनी’ का वर्णन हुआ है वे सभी ‘पद्मावत’ के परवर्ती हैं।लेकिन बावजूद इन सब के चित्तोड़ में हमें रानी पद्मावती की छाप दिखाई देती है। 

पद्मिनी का बचपन और स्वयंवर में रतन सिंह से विवाह Rani Padmini History in Hindi

पदमिनी के पिता का नाम गंधर्वसेन और माता का नाम चंपावती था | Rani Padmini History in Hindi  रानी पद्मिनी के पिता गंधर्वसेन सिंहल प्रान्त के राजा थे |बचपन में पदमिनी के पास “हीरामणी ” नाम का बोलता तोता हुआ करता था जिससे साथ उसमे अपना अधिकतर समय बिताया था | रानी पदमिनी बचपन से ही बहुत सुंदर थी और बड़ी होने पर उसके पिता ने उसका स्वयंवर आयोजित किया | इस स्वयंवर में उसने सभी हिन्दू राजाओ और राजपूतो को बुलाया | एक छोटे प्रदेश का राजा मलखान सिंह भी उस स्वयंवर में आया था |

राजा रावल रतन सिंह भी पहले से ही अपनी एक पत्नी नागमती होने के बावजूद स्वयंवर में गया था | प्राचीन समय में राजा एक से अधिक विवाह करते थे ताकि वंश को अधिक उत्तराधिकारी मिले | राजा रावल रतन सिंह ने मलखान सिंह को स्वयंमर में हराकर पदमिनी Padmavati से विवाह कर लिया | विवाह के बाद वो अपनी दुसरी पत्नी पदमिनी के साथ वापस चित्तोड़ लौट आया |

Rani Padmini History in Hindi | रानी पद्मिनी का इतिहास | Rani Padmavati History

12 वीं एवं 13 वीं शताब्दी के समय चित्तोड़ में राजपुत राजा ‘रावल रतन सिंह’ का राज्य था, जो सिसोदिया राजवंश के थे. वे एक बहादुर और महान योद्धा थे.राघव चेतक जो की एक गायक था उसके द्वारा रानी के  रूप का वर्णन सुनकर दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने चित्तौड़गढ़ पर आक्रमण कर दिया था। 8 वर्षों के युद्ध के बाद भी अलाउद्दीन खिलजी चित्तौड़ पर विजय प्राप्त नहीं कर सका तो लौट गया और दूसरी बार आक्रमण करके उस ने छल से राजा रतनसेन को बंदी बनाया और उसे लौटाने की शर्त के रूप में पद्मावती को मांगा। तब पद्मावती की ओर से भी छल का सहारा लिया गया और गोरा-बादल की सहायता से अनेक वीरों के साथ वेश बदलकर पालकियों में पद्मावती की सखियों के रूप में जाकर राजा रतनसेन को मुक्त कराया गया। परंतु इस छल का पता चलते ही अलाउद्दीन खिलजी ने प्रबल आक्रमण किया, जिसमें दिल्ली गये प्रायः सारे राजपूत योद्धा मारे गये।

राजा रतनसेन चित्तौड़ लौटा परंतु यहाँ आते ही उन्हें कुंभलनेर पर आक्रमण करना पड़ा और कुंभलनेर के शासक देवपाल के साथ युद्ध में देवपाल मारा गया परंतु राजा रतनसेन भी अत्यधिक घायल होकर चित्तौड़ लौटा और स्वर्ग सिधार गया। उधर पुनः अलाउद्दीन खिलजी का आक्रमण हुआ। रानी पद्मावती अन्य सोलह सौ स्त्रियों के साथ जौहर करके भस्म हो गयी तथा किले का द्वार खोल कर लड़ते हुए सारे राजपूत योद्धा मारे गये। अलाउद्दीन खिलजी को राख के सिवा और कुछ नहीं मिला।

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