दीपावली 2018 लक्ष्मी गणेश की पूजा विधि हिंदी में

diwali pooja vidhi 2017 in hindi

दीपावली/Diwali हिन्दुओ का सबसे पवित्र त्यौहार है इस  दिन भगवान श्री गणेश, माँ  लक्ष्मी और सरस्वती की पूजा-अर्चना  की जाती है। जिसमे की भगवान श्री गणेश जी से रिद्धि- सिद्धि का आशीर्वाद और देवी लक्ष्मी धन समृद्धि का वरदान देती है। दिवाली की पूजा में किसी भी प्रकार की भूल चूक नहीं होनी चाहिए।

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ऐसे करें दीवाली पर लक्ष्मी-गणेश पूजन, घर आएंगी सुख-समृद्धि

दीपावली कब और कहाँ मनाई जाती है:

Diwali का त्यौहार प्रमुख रूप से भारत में मनाया जाता है और यह हिन्दू धर्म का प्रमुख त्यौहार है .दीपावली का  त्यौहार कार्तिक मास की  अमावस्या के दिन मनाया जाता है। यह त्यौहार 5 दिनों (धनतेरस, नरक चतुदर्शी, अमावश्या, कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा, भाई दूज) का होता है इसलिए यह धनतेरस से शुरू होकर भाई दूज पर सम्पन होता है।

Diwali 2017: जानिए दीवाली पर पूजा का शुभ मुहूर्त/ Diwali Laxmi Pooja 2017 Shubh Muhurat Timing

  1. प्रदोष काल मुहूर्त
    मां लक्ष्मी पूजा का शुभ मुहूर्त: शाम 05.43 से 08.16 तक
    वृषभ काल: शाम 7.11 से 9.06 तक
  2. चौघड़िया पूजा मुहूर्त
    सुबह: 6.28 से 7.53
    शाम: 4.19 से 8.55
  3. महानिशिता काल मुहूर्त
    लक्ष्मी पूजा का अवधि- 51 मिनट
    महानिशिता काल- 11.40 से 12.31

दीवाली क्यों मनाई जाती है:

हिन्दू धर्म में ऐसी मान्यता है की मां लक्ष्मी अपने भक्तों की धन से जुड़ी हर समस्या को दूर अपने भक्तो के कष्टों का निवारण करती हैं. और दीपावली की विशेष विधि विधान से पूजा अर्चना की जाती है जिससे की सुख-समृद्धि, बुद्धि तथा घर में शांति और उन्नति का वरदान मांगा जाता है .

दीवाली पर देवी-देवताओं की पूजा में कुछ विशेष बातों का ध्यान रखा जाता है जो निम्न प्रकार हैं-

दीपावली पूजन सामग्री की सूची:

Deepavali Poojan Ki Samagri
Deepavali Poojan Ki Samagri

 

दीवाली पूजा के लिए लक्ष्मीजी का पाना (अथवा मूर्ति) , गणेशजी की मूर्ति , सरस्वती का चित्र ,धूप बत्ती (अगरबत्ती),चंदन,कपूर,केसर,यज्ञोपवीत 5 , कुंकु , चावल , अबीर , गुलाल, अभ्रक , हल्दी , सौभाग्य द्रव्य- मेहँदी , चूड़ी, काजल, पायजेब,  बिछुड़ी आदि आभूषण , नाड़ा , रुई , रोली, सिंदूर , सुपारी, पान के पत्ते , पुष्पमाला, कमलगट्टे , धनिया खड़ा , सप्तमृत्तिका , सप्तधान्य , कुशा व दूर्वा , पंच मेवा , गंगाजल , शहद (मधु) , शकर , घृत (शुद्ध घी) , दही , दूध , ऋतुफल , (गन्ना, सीताफल, सिंघाड़े इत्यादि) , नैवेद्य या मिष्ठान्न (पेड़ा, मालपुए इत्यादि) , इलायची (छोटी) , लौंग , मौली , इत्र की शीशी , तुलसी दल , सिंहासन (चौकी, आसन) , पंच पल्लव (बड़, गूलर, पीपल, आम और पाकर के पत्ते) , औषधि (जटामॉसी, शिलाजीत आदि) , चाँदी का सिक्का , लक्ष्मीजी को अर्पित करने हेतु वस्त्र , गणेशजी को अर्पित करने हेतु वस्त्र , अम्बिका को अर्पित करने हेतु वस्त्र , जल कलश (ताँबे या मिट्टी का) , सफेद कपड़ा (आधा मीटर) , लाल कपड़ा (आधा मीटर) , पंच रत्न (सामर्थ्य अनुसार) , दीपक , बड़े दीपक के लिए तेल , ताम्बूल (लौंग लगा पान का बीड़ा) , श्रीफल (नारियल) , धान्य (चावल, गेहूँ) , लेखनी (कलम) , बही-खाता, स्याही की दवात , तुला (तराजू) , पुष्प (गुलाब एवं लाल कमल) , एक नई थैली में हल्दी की गाँठ,  खड़ा धनिया व दूर्वा आदि , खील-बताशे , अर्घ्य पात्र सहित अन्य सभी पात्र और देवी  देवताओं के प्रसाद हेतु मिष्ठान्न जो की बिना वर्क को हो.

दीपावली पूजन की विधि: how to do laxmi puja at home

diwali pooja vidhi 2017 in hindi
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सर्वप्रथम दीवाली की पूजा में एक चौकी पर सफेद वस्त्र बिछा कर उस पर मां लक्ष्मी, सरस्वती व गणेश जी का चित्र या प्रतिमा को विराजमान करें। इसके उपरांत हाथ में पूजा के जलपात्र से थोड़ा-सा जल लेकर प्रतिमा के ऊपर मंत्र

ऊँ अपवित्र: पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोपि वा।

य: स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स: वाह्याभंतर: शुचि:।।

पढ़ते हुए जल को छिड़कें। बाद में इसी तरह से स्वयं को तथा अपने पूजा के आसन को भी इसी तरह जल छिड़क कर पवित्र कर लें।

और उसके उपरांत पृथ्वी को प्रणाम करके मंत्र

पृथ्विति मंत्रस्य मेरुपृष्ठः ग ऋषिः सुतलं छन्दः कूर्मोदेवता आसने विनियोगः॥

ॐ पृथ्वी त्वया धृता लोका देवि त्वं विष्णुना धृता।

त्वं च धारय मां देवि पवित्रं कुरु चासनम्‌॥

पृथिव्यै नमः आधारशक्तये नमः ।

इसके बाद “ॐ केशवाय नमः, ॐ नारायणाय नमः, ॐ माधवाय नमः।।

 

कहते हुए गंगाजल का आचमन करें तथा उनसे क्षमा प्रार्थना करते हुए अपने आसन पर विराजमान हो जाये.

इसके बाद मन को एकांत कर आंखें बंद करें तथा माता को मन में ही मन प्रणाम करें और माता का ध्यान करे। इसके बाद हाथ में जल लेकर पूजा का संकल्प करें। संकल्प के लिए हाथ में अक्षत (चावल), पुष्प और जल ले लीजिए और साथ में एक सिक्का लेकर संकल्प करें कि मैं अमुक व्यक्ति अमुक स्थान व समय पर मां लक्ष्मी, सरस्वती तथा गणेशजी की पूजा करने जा रहा हूं, जिससे मुझे शास्त्रोक्त फल प्राप्त हों।

उसके उपरांत सर्वप्रथम प्रथम पूजनीय भगवान गणेशजी की पूजा कर माता गौरी की पूजन फिर कलश पूजन करें और फिर नवग्रहों का पूजन करे। हाथ में अक्षत और पुष्प लेकर नवग्रह स्तोत्र बोलिए। इसके बाद  भगवती षोडश मातृकाओं का पूजन किया जाता है। इन सभी के पूजन के उपरांत 16 मातृकाओं को गंध, अक्षत व पुष्प प्रदान करते हुए पूजन करें। पूरी प्रक्रिया मौलि लेकर गणपति, माता लक्ष्मी व सरस्वती को अर्पण कर और स्वयं के हाथ पर भी बंधवा लें।

सभी देवी-देवताओं के तिलक लगाकर स्वयं को भी तिलक लगवाएं। इसके बाद मां महालक्ष्मी की पूजा आरंभ करें।

फिर भगवान गणेशजी, लक्ष्मीजी का पूजन करें। प्रतिमा के आगे 7, 11 या 21 घी के दीपक जलाएं तथा मां को श्रृंगार सामग्री अर्पण करें। मां को भोग लगा कर उनकी आरती करें। श्रीसूक्त, लक्ष्मीसूक्त व कनकधारा स्रोत का पाठ करें। इस तरह से आपकी पूजा पूर्ण होती है।

 

पूजा के बाद क्षमा-प्रार्थना करें

पूजा पूर्ण होने के बाद पूजा में जाने अनजाने में कोई भी गलती के लिए मां से क्षमा-प्रार्थना करें।

मां न मैं आह्वान करना जानता हूँ, न विसर्जन करना। पूजा-कर्म भी मैं नहीं जानता। हे परमेश्वरि! मुझे क्षमा करो। मन्त्र, क्रिया और भक्ति से रहित जो कुछ पूजा मैंने की है, हे देवि! वह मेरी पूजा सम्पूर्ण हो। यथा-सम्भव प्राप्त उपचार-वस्तुओं से मैंने जो यह पूजन किया है,


गणेश जी की आरती / ganesh puja aarti 2017

जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा, माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा।।
एक दंत दयावंत चार भुजाधारी।
माथे पर तिलक सोहे, मुसे की सवारी।
जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा, माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा।।
पान चढ़े फूल चढ़े और चढ़े मेवा।
लड्डुवन का भोग लगे, संत करे सेवा।।
जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा, माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा।।
अंधन को आंख देत, कोढ़ियन को काया।
बांझन को पुत्र देत, निर्धन को माया।।
सुर श्याम शरण आये सफल कीजे सेवा।। जय गणेश देवा
जय गणेश जय गणेश देवा। माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा।।


लक्ष्मीजी की आरती / laxmi pujan aarti 2017

ॐ जय लक्ष्मी माता मैया जय लक्ष्मी माता
तुमको निसदिन सेवत, हर विष्णु विधाता॥ ॐ जय लक्ष्मी माता….
उमा, रमा, ब्रम्हाणी, तुम जग की माता
सूर्य चद्रंमा ध्यावत, नारद ऋषि गाता॥ ॐ जय लक्ष्मी माता….
दुर्गारूप निरंजन, सुख संपत्ति दाता
जो कोई तुमको ध्याता, ऋद्धि सिद्धी धन पाता॥ ॐ जय लक्ष्मी माता….
तुम ही पाताल निवासनी, तुम ही शुभदाता
कर्मप्रभाव प्रकाशनी, भवनिधि की त्राता॥ ॐ जय लक्ष्मी माता….
जिस घर तुम रहती हो, ताँहि में हैं सद्गुण आता
सब सभंव हो जाता, मन नहीं घबराता॥ ॐ जय लक्ष्मी माता….
तुम बिन यज्ञ ना होता, वस्त्र न कोई पाता
खान पान का वैभव, सब तुमसे आता॥ ॐ जय लक्ष्मी माता….
शुभ गुण मंदिर, सुंदर क्षीरनिधि जाता
रत्न चतुर्दश तुम बिन, कोई नहीं पाता॥ ॐ जय लक्ष्मी माता….
महालक्ष्मी जी की आरती, जो कोई नर गाता
उर आंनद समाता, पाप उतर जाता॥ ॐ जय लक्ष्मी माता….
स्थिर चर जगत बचावै, कर्म प्रेर ल्याता
तेरा भगत मैया जी की शुभ दृष्टि पाता॥ ॐ जय लक्ष्मी माता….
ॐ जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता,
तुमको निसदिन सेवत, हर विष्णु विधाता॥ ॐ जय लक्ष्मी माता….


श्री सूक्त का अर्थ:

श्री सूक्तम् माँ  देवी लक्ष्मी की अाराधना करने हेतु उनको समर्पित मंत्र हैं। जिसे की  ‘लक्ष्मी सूक्तम्’ भी कहते हैं। सूक्त को ऋग्वेद से लिया गया है। इस श्री सूक्त का पाठ करने से धन की देवी लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती  है। सम्पूर्ण मंत्र नीचे दिया जा रहा है .

।।श्री सूक्त।।

ॐ हिरण्य-वर्णां हरिणीं, सुवर्ण-रजत-स्त्रजाम्।
चन्द्रां हिरण्यमयीं लक्ष्मीं, जातवेदो म आवह।।

तां म आवह जात-वेदो, लक्ष्मीमनप-गामिनीम्।
यस्यां हिरण्यं विन्देयं, गामश्वं पुरूषानहम्।।

अश्वपूर्वां रथ-मध्यां, हस्ति-नाद-प्रमोदिनीम्।
श्रियं देवीमुपह्वये, श्रीर्मा देवी जुषताम्।।

कांसोऽस्मि तां हिरण्य-प्राकारामार्द्रा ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीं।
पद्मे स्थितां पद्म-वर्णां तामिहोपह्वये श्रियम्।।

चन्द्रां प्रभासां यशसा ज्वलन्तीं श्रियं लोके देव-जुष्टामुदाराम्।
तां पद्म-नेमिं शरणमहं प्रपद्ये अलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वां वृणोमि।।

आदित्य-वर्णे तपसोऽधिजातो वनस्पतिस्तव वृक्षोऽक्ष बिल्वः।
तस्य फलानि तपसा नुदन्तु मायान्तरायाश्च बाह्या अलक्ष्मीः।।

उपैतु मां दैव-सखः, कीर्तिश्च मणिना सह।
प्रादुर्भूतोऽस्मि राष्ट्रेऽस्मिन्, कीर्तिं वृद्धिं ददातु मे।।

क्षुत्-पिपासाऽमला ज्येष्ठा, अलक्ष्मीर्नाशयाम्यहम्।
अभूतिमसमृद्धिं च, सर्वान् निर्णुद मे गृहात्।।

गन्ध-द्वारां दुराधर्षां, नित्य-पुष्टां करीषिणीम्।
ईश्वरीं सर्व-भूतानां, तामिहोपह्वये श्रियम्।।

मनसः काममाकूतिं, वाचः सत्यमशीमहि।
पशूनां रूपमन्नस्य, मयि श्रीः श्रयतां यशः।।

कर्दमेन प्रजा-भूता, मयि सम्भ्रम-कर्दम।
श्रियं वासय मे कुले, मातरं पद्म-मालिनीम्।।

आपः सृजन्तु स्निग्धानि, चिक्लीत वस मे गृहे।
निच-देवी मातरं श्रियं वासय मे कुले।।

आर्द्रां पुष्करिणीं पुष्टिं, सुवर्णां हेम-मालिनीम्।
सूर्यां हिरण्मयीं लक्ष्मीं, जातवेदो ममावह।।

आर्द्रां यः करिणीं यष्टिं, पिंगलां पद्म-मालिनीम्।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं, जातवेदो ममावह।।

तां म आवह जात-वेदो लक्ष्मीमनप-गामिनीम्।
यस्यां हिरण्यं प्रभूतं गावो दास्योऽश्वान् विन्देयं पुरूषानहम्।।

यः शुचिः प्रयतो भूत्वा, जुहुयादाज्यमन्वहम्।
श्रियः पंच-दशर्चं च, श्री-कामः सततं जपेत्।।


॥श्री लक्ष्मी सूक्त॥

ॐ पद्मानने पद्मिनि पद्मपत्रे पद्ममप्रिये पदमदलायताक्षि ।
विश्वप्रिये विश्वमनोऽनुकूलेत्वत्पादपद्मं मयि सन्निधत्स्व ।।

पद्मानने पद्मऊरु पद्माक्षी पदमसंभवे ।
तन्मे भजसि पद्माक्षी येन सौख्यंलभाम्यहम् ।।

अश्वदायि गोदायि धनदायि महाधने ।
धनं मे जुषतां देवीसर्वकामांश्चदेहि मे ।।

पुत्रं पौत्रं धनं धान्यं हस्तिअश्वादि गवेरथम् ।
प्रजानां भवसिमाता आयुष्मन्तं करोतुमे ।।

धनमग्निर्धनं वायुर्धनं सूर्यो धनं वसुः ।
धनमिन्द्रो वृहस्पतिर्वरुणोधनमस्तु मे ।।

वैनतेय सोमंपिब सोमं पिबतु वृत्रहा ।
सोमंधनस्यसोमिनो मह्यं ददातु सोमिनः ।।

न क्रोधो न च मात्सर्य न लोभो ना शुभामतिः ।
भवन्ति कृत पुण्यानांभक्तानां श्री सूक्त जापिनाम् ।।

सरसिजनिलये सरोजहस्ते धवलतरांशुक गन्धमाल्यशोभे ।
भगवति हरिवल्लभे मनोज्ञे त्रिभुवन मूतिकरिप्रसीद मह्यम् ।।

विष्णुपत्नीं क्षमां देवीं माधवीं माधवप्रियाम् ।
लक्ष्मींप्रियसखीं देवी नमाम्यच्युतवल्लभाम् ।।

महालक्ष्म्यै च विद्महे विष्णुपत्न्यै च धीमहि ।
तन्नो लक्ष्मीः प्रचोदयात् ।।

आनन्दः कर्दमः श्रीदः श्चिक्लीत इति विश्रुताः ।
ऋषयश्चश्रियः पुत्राः मयि श्रीर्देविदेवता मताः ।।

ऋणरोगादिदारिद्रय पापक्षुदपमृत्यवः ।
भयशोकमनस्तापा नश्यन्तुममसर्वदा ।।

श्रीयं वर्चस्वमायुष्यंमारोग्यमानं मांविधाच्छोभमानं महीयते ।
धान्यं धनं पशुं बहुपुत्रलाभं शतसंवत्सरंदीर्घमायुः ।।

ऋग्वेदोक्तं लक्ष्मी सूक्त सम्पूर्णम् ।


श्री कनक धारा स्तोत्रम् – Kanakdhara Stotram

अंग हरे: पुलकभूषणमाश्रयन्ती भृंगांगनेव मुकुलाभरणं तमालम ।
अंगीकृताखिल विभूतिरपांगलीला मांगल्यदास्तु मम मंगलदेवताया: ।।1।।

मुग्धा मुहुर्विदधती वदने मुरारे: प्रेमत्रपाप्रणिहितानि गतागतानि ।
माला दृशोर्मधुकरीव महोत्पले या सा मे श्रियं दिशतु सागरसम्भवाया: ।।2।।

विश्वामरेन्द्रपदविभ्रमदान दक्षमानन्दहेतुरधिकं मुरविद्विषोsपि ।
ईषन्निषीदतु मयि क्षण मीक्षणार्ध मिन्दीवरोदर सहोदरमिन्दिराया: ।।3।।

आमीलिताक्षमधिगम्य मुदा मुकुन्दमानन्दकन्दमनिमेषमनंगतन्त्रम ।
आकेकरस्थितकनीनिकपक्ष्मनेत्रम भूत्यै भवेन्मम भुजंगशयांगनाया: ।।4।।

बाह्यन्तरे मुरजित: श्रितकौस्तुभे या हारावलीव हरिनीलमयी विभाति ।
कामप्रदा भगवतोsपि कटाक्षमाला कल्याणमावहतु मे कमलालयाया: ।।5।।

कालाम्बुदालि ललितोरसि कैटभारे र्धाराधरे स्फुरति या तडिदंगनेव ।
मातु: समस्तजगतां महनीय मूर्तिर्भद्राणि मे दिशतु भार्गवनन्दनाया: ।।6।।

प्राप्तं पदं प्रथमत: किल यत्प्रभावान्मांगल्यभाजि मधुमाथिनि मन्मथेन ।
मय्यापतेत्तदिह मन्थरमीक्षणार्धम मन्दालसं च मकरालयकन्यकाया: ।।7।।

दद्याद्दयानुपवनो द्रविणाम्बुधारा-मस्मिन्नकिंचन विहंगशिशौ विषण्णे ।
दुष्कर्मघर्ममपनीय चिराय दूरं नारायणप्रणयिनीनयनाम्बुवाह: ।।8।।

इष्टा विशिष्टमतयोsपि यया दयार्द्रदृष्टया त्रिविष्टपपदं सुलभं लभन्ते ।
दृष्टि: प्रह्रष्टमकमलोदरदीप्तिरिष्टाम पुष्टिं कृषीष्ट मम पुष्करविष्टराया: ।।9।।

गीर्देवतेति गरुड़ध्वजसुन्दरीति शाकम्भरीति शशिशेखरवल्लभेति ।
सृष्टिस्थितिप्रलयकेलिषु संस्थितायै तस्यै नमस्त्रिभुवनैक गुरोस्तरुण्यै ।।10।।

श्रुत्यै नमोsस्तु शुभकर्मफलप्रसूत्यै रत्यै नमोsस्तु रमणीयगुणार्णवायै ।
शक्त्यै नमोsस्तु शतपत्रनिकेतनायै पुष्टयै नमोsस्तु पुरुषोत्तम वल्लभायै ।।11।।

नमोsस्तु नालीकनिभाननायै नमोsस्तु दुग्धोदधिजन्मभूत्यै ।
नमोsस्तु सोमामृतसोदरायै नमोsस्तु नारायणवल्लभायै ।।12।।

सम्पत्कराणि सकलेन्द्रियनन्दनानि साम्राज्यदानविभवानि सरोरुहाक्षि ।
त्वद्वन्दनानि दुरिताहरणोद्यतानि मामेव मातरनिशं कलयन्तु मान्ये ।।13।।

यत्कटाक्षसमुपासनाविधि: सेवकस्य सकलार्थसम्पद: ।
सन्तनोति वचनांगमानसैस्त्वां मुरारिहृदयेश्वरीं भजे ।।14।।

सरसिजनिलये सरोजहस्ते धवलतमांशुकगन्धमाल्यशोभे ।
भगवति हरिवल्लभे मनोज्ञे त्रिभुवनभूतिकरि प्रसीद मह्यम ।।15।।

दिग्घस्तिभि: कनककुम्भमुखाव सृष्टस्वर्वाहिनीविमलचारुजलप्लुतांगीम ।
प्रातर्नमामि जगतां जननीमशेष लोकाधिनाथगृहिणीममृताब्धि पुत्रीम ।।16।।

कमले कमलाक्षवल्लभे त्वं करुणापूरतरंगितै रपांगै: ।
अवलोकय मामकिंचनानां प्रथमं पात्रमकृत्रिमं दयाया: ।।17।।

स्तुवन्ति ये स्तुतिभिरमूभिरन्वहं त्रयीमयीं त्रिभुवनमातरं रमाम ।
गुणाधिका गुरुतर भाग्यभागिनो ते भुवि बुधभाविताशया: ।।18।

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