Mahatma Gandhi Biography in Hindi | महात्मा गांधी की जीवनी

Mahatma Gandhi Biography in Hindi

 Mahatma Gandhi जिनका पूरा नाम मोहनदास करमचन्द गान्धी (Mohandas Karamchand Gandhi)था और दुनिया उन्हें  महात्मा गान्धी, बापु, गांधीजी  के नाम से भी जानती है .आइये जानते है Life History of Mahatma Gandhi Biography,family,date of birth,date of Death,story,Gandhi’s marital life,Gandhi’s contribution to the Indian freedom movement,Political Views in Indian History and Much More..

मोहनदास करमचन्द गांधी (2 अक्टूबर 1869 – 30 जनवरी 1948) भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के एक प्रमुख नेता थे। वे अहिंसावादी ( Nonviolent)थे उन्होंने हमेशा लोगो को अहिसापूर्ण तरीके से आन्दोलन करने के लिए प्रेरित किया उन्हें बापू  के नाम से भी याद किया जाता है।

प्रति वर्ष 2 अक्टूबर को उनका जन्मंदिन भारत में गाँधी जयन्ती तथा सम्पूर्ण विश्व में अन्तराष्ट्रीय अंहिसा दिवस के रूप में मनाया जाता है। गाँधी को महात्मा के नाम से सबसे पहले 1915 में राजवैद्य जीवराम कालिदास ने संबोधित किया था।

सुभाष चन्द्र बोस ने 6 जुलाई 1944 को रंगून रडियो से गाँधी जी के नाम से जारी प्रसारण में उन्हें राष्ट्रपिता कहकर संबोधित किया साथ ही आजाद हिन्द फोज के सेनिको के लिए उनका आशीर्वाद और शुभकामनाये माँगी थी।

सबसे पहले गाँधी जी ने प्रवासी वकील के रूप में दक्षिण अफ्रीका में भारतीय समुदाय के लोगों के नागरिक अधिकारों के लिये संघर्ष हेतु सत्याग्रह करना शुरू किया। 1915 में वे भारत लोटे उसके बाद उन्होंने यहाँ के किसानों, मजदूरों और शहरी श्रमिकों को अत्यधिक भूमि कर और भेदभाव के विरुद्ध आवाज उठाने के लिये संगठित किया 1921 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की बागडोर संभालने के बाद उन्होंने देशभर में गरीबी से राहत दिलाने, महिलाओं के अधिकारों का विस्तार करने , धार्मिक (Religious)एंव जातीय एकता का निर्माण व अस्पृश्‍यता(Untouchability)के विरोध में अनेकों कार्यक्रम चलाये।

इन सभी कार्यकर्मो में विदेशी राज से मुक्ति दिलाने वाला स्वराज की प्राप्ति वाला कार्यक्रम ही प्रमुख था। गाँधी जी ने ब्रिटिश सरकार द्वारा भारतीयों पर लगाये गये नमक कर के विरोध में 1930 में नमक सत्याग्रह और इसके बाद 1942में अंग्रेजो भारत छोड़ो आन्दोलन(Quit India Movement) से बहुत सारी प्रसिद्धि प्राप्त की। इन सब आंदोलनों के दोरान उन्हें कई वर्षो तक जेल में भी रहना पड़ा
गाँधी जी ने हमेशा सभी परिस्थितियों में अहिंसा और सत्य का पालन किया और इनका पालन करने का सन्देश भी दिया उन्होंने हमेशा शाकाहारी भोजन(vegetarian food) खाया और आत्मशुद्धि के लिये लम्बे-लम्बे उपवास (Fasting)रखे।

Name/नाम मोहनदास करमचन्द गान्धी / Mohandas Karamchand Gandhi
Born/जन्म 2 October 1869 पोरबंदर, काठियावाड़, गुजरात, भारत
Died / मृत्यु 30 जनवरी 1948
माता /  पिता करमचन्द उत्तमचन्द गाँधी  एवं पुतलीबाई
Nationality/नागरिकता भारतीय
Field/क्षेत्र /प्रसिद्धि कारण वकालत, राजनीति,भारतीय स्वतंत्रता संग्राम
शिक्षा युनिवर्सिटी कॉलिज, लंदन
External links/बाहरी लिंक  wikipedia

महात्मा गांधी आरंभिक जीवन / Mahatma Gandhi Biography in Hindi :

गान्धी जी का जन्म भारत के एक राज्य गुजरात के एक तटीय शहर पोरबंदर नामक स्थान पर 2अक्टूबर सन् 1869 को हुआ था। उनके पिता का नाम करमचंद गाँधी था जो सनातन धर्म की पंसारी जाति से थे और ब्रिटिश शासनकाल के समय काठियावाड़ की एक छोटी सी रियासत पोरबंदर के प्रधान मन्त्री थे उनकी माता का नाम पुतलीबाई था जो परनामी वेश्या समुदाय की थी पुतलीबाई करमचंद की चोथी पत्नी थी उनकी पहली तीन  पत्निया प्रसव के समय मर गयी थी ।

गाँधी शब्द का गुजरती भाषा में अर्थ पंसारी तथा हिंदी भाषा में अर्थ इत्र फुलेल बेचने वाला जिसे अंग्रेजी में Perfumer कहा जाता है। भक्ति करने करने वाली माता की देखरेख और उस क्षेत्र की जैन परम्पराओं के कारण युवा मोहनदास पर वे प्रभाव प्रारम्भ में ही पड़ गये थे जिन्होंने आगे चलकर उनके जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी ये प्रभाव थे शाकाहारी जीवन, आत्मशुद्धि के लिये उपवास, दुर्बलों में जोश की भावना,विभिन्न जातियों के लोगों के बीच सहिष्णुता।

गांधीजी का वैवाहिक जीवन

Gandhi’s marital life सन 1883 में मई के महीने में सिर्फ साढ़े 23 साल की आयु पूर्ण करते ही उनका विवाह 24 साल की कस्तूरबा माखनजी से कर दिया गया। पत्नी का पहला नाम छोटा करके कस्तूरबा कर दिया गया उसे सभी लोग बा कहकर पुकारते थे।
महात्मा गाँधी और कस्तूरबा का यह विवाह उनके माता पिता द्वारा तय किया गया था और व्यवस्थित बाल विवाह था। जो उस समय उस क्षेत्र में प्रचलित था। लेकिन उस क्षेत्र में यही रीति थी कि किशोर दुल्हन को अपने माता पिता के घर और अपने पति से अलग ज्यादा
समय तक रहना पड़ता था

गाँधी जी जब 25 वर्ष के थे तब गाँधी जी की पहली संतान ने जन्म लिया लेकिन उसकी कुछ ही दिनों में मर्त्यु हो गई और इसी वर्ष गाँधी जी के पिता करमचंद भी चल बसे गाँधी जी की चार संतान हुई जो सभी पुत्र थे ।
हरीलाल गान्धी 1888 में, मणिलाल गान्धी 1892 में, रामदास गान्धी 1897 में और देवदास गांधी 1900 में जन्मे।

शिक्षा

पोरबन्दर से उन्होंने मिडिल तथा राजकोट से हाई स्कूल किया दोनों परीक्षाओं में गाँधी जी एक औसत छात्र रहे।
मैट्रिक के बाद की परीक्षा उन्होंने कुछ परेशानी के साथ उत्तीर्ण की। गाँधी जी का परिवार उन्हें बैरिस्टर बनाना चाहता था ।

विदेश में शिक्षा व विदेश में ही वकालत (Education abroad and advocacy abroad) –

गाँधी जी अपने 29वें जन्मदिन से लगभग एक महीने पहले ही 4 सितम्बर 1888 को यूनिवर्सिटी कॉलेज लन्दन में कानून की पढाई करने और बैरिस्टर बनने के लिये इंग्लैंड चले गये। भारत को छोड़ते समय जैन भिक्षु बेचारजी के समक्ष हिन्दुओं को बुरी विचारधारा को त्यागने के लिए अपनी अपनी माता जी को दिए गये एक वचन ने उनके शाही राजधानी लन्दन में बिताये गये समय को काफी प्रभावित किया।

हालाँकि गाँधी जी ने अंग्रेजी रीति रिवाजों का अनुभव भी किया उदाहरण के तोर पर गाँधी जी का नृत्य कक्षाओं में जाना। फिर भी वह अपनी मकान मालकिन द्वारा मांस एंव पत्ता गोभी को हजम नहीं कर सके। उन्होंने कुछ भोजनालयो की और इशारा किया जो शाकाहारी थे अपनी माता की इच्छाओं को उन्होंने सीधा नहीं बौद्धिकता से शाकाहारी भोजन को अपना भोजन स्वीकार किया उन्होंने शाकाहारी समाज की सदस्यता ग्रहण और इसकी कार्यकारी समिति के लिए उनका चयन भी हुआ और उन्होंने एक स्थानीय अध्याय की नींव भी रखी वे जिन शाकाहारी लोगों से मिले उनमें से कुछ थियोसोफिकल सोसायटी के सदस्य भी थे। इस सोसाइटी की स्थापना 1895 में विश्व बन्धुत्व को प्रबल करने के लिये की गयी थी लोगों ने उन्हें श्रीमद्भगवद्गीता पढ़ने के लिये प्रेरित किया। उन्होंने विभिन्न धर्मो के बारे में पढने में विशेष रुचि नहीं दिखायी ।

इंग्लैंड और वेल्स बार एसोसिएशन में वापस बुलावे पर वे भारत लौट आये किन्तु बम्बई में वकालत करने में उन्हें ख़ास सफलता नहीं मिली इनका एक हाई स्कूल शिक्षक के रूप में अंशकालिक नोकरी का प्रार्थना पत्र अस्वीकार कर दिया गया और जरूरत मंद लोगों के लिए
मुकदमे की अर्जिया लिखने लगे और राजकोट को ही स्थायी मुकाम बना लिया परन्तु एक अंग्रेज अधिकारी की मूर्खता के कारण उन्हें यह कारोबार भी छोड़ना पड़ा। अपनी आत्मकथा में उन्होंने इस घटना का वर्णन उन्होंने किया है

दक्षिण अफ्रीका (1893-1914) में नागरिक अधिकारों के आन्दोलन-

Gandhi’s contribution to the Indian freedom movement दक्षिण अफ्रीका में गान्धी को भारतीय मूल के लोगों के साथ भेदभाव भी देखने को मिला ऐसा एक बार उनके साथ भी हुआ आरम्भ में उन्हें प्रथम श्रेणी कोच की वैध टिकट होने के बाद तीसरी श्रेणी के डिब्बे में जाने से इन्कार करने के लिए ट्रेन से बाहर फेंक दिया गया था।
क्योकि गाँधी जी काले थे इतना ही नहीं पायदान पर बैठकर शेंष यात्रा करते हुए एक यूरोपियन यात्री के अन्दर आने पर चालक की मार भी झेलनी पड़ी।

उन्हें अपनी इस यात्रा में कई कठिनाईयों का भी सामना करना पड़ा दक्षिण अफ्रीका में कई होटलों को गाँधी जी के लिए वर्जित
कर दिया गया इसी तरह ही बहुत सी घटनाए गाँधी जी के साथ हुई जिनमे एक यह भी थी जिसमे आदालत के एक न्यायाधीश ने उन्हें अपनी पगड़ी उतारने का आदेश दिया था परन्तु गाँधी जी ने उसे माना नहीं ये सभी घटनाये गाँधी जी के जीवन में मोड़ बन गयी और
विद्यमान सामाजिक अन्याय के प्रति जागरुकता का कारण बनीं दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों पर हो रहे अन्याय को देखते हुए गान्धी ने अंग्रेजी साम्राज्य के अन्तर्गत अपने देशवासियों के सम्मान तथा स्वय की स्थिति के लिए प्रश्न उठाये।

1906 के ज़ुलु युद्ध में भूमिका-

1906 में,जुलु के द्वारा दक्षिण अफ्रीका में नये चुनाव कर लगा देने के बाद दो अंग्रेज अधिकारी मार डाले गये उसके बदले में अंग्रेज अधिकारियो ने जुलु के खिलाफ युद्ध शुरू कर दिया गाँधी जी ने भारतीय मूल के लोगों को सेना में भर्ती के लिए ब्रिटिश अधिकारियो को प्रेरित किया ।

गाँधी जी का कहना था की भारतीयों को अपनी नागरिकता के दावों को क़ानूनी जमा पहनाने के लिए युद्ध प्रयासों में ब्रिटिश सेना का सहयोग देना चाहिए तब भी अंग्रेजो ने भारतीयों को अपनी सेना में पद देने से इन्कार कर दिया था उन्होंने गाँधी जी के इस प्रस्ताव को मान  लिया
की भारतीय युद्ध में घायल अंग्रेज सेनिको का उपचार करने के लिए उन्हें स्टेचर पर लाने के लिए स्वैच्छा पूर्वक कार्य कर सकते हैं। इस कोर की बागडोर गांधी ने थामी ।

21 जुलाई 1906 (july-21,1906) को गाँधी जी ने भारतीय जनमत इंडियन ओपिनियन (indian opinion) लिखा था की जो 23 भारतीयों के खिलाफ ओपरेशन चलाया गया था उसके सम्बन्ध में नेटल सरकार के कहने पर एक कोर का गठन किया गया है।
दक्षिण अफ्रीका (South Afrika) में भारतीय इंडियन ओपिनियन में अपने कॉलमों के माध्‍यम से इस युद्ध में शामिल होने के लिए आग्रह किया और कहा की -यदि सरकार को यही महसूस होता है की आरक्षित बल बेकार हो रहे है तभी वे इसका उपयोग करेंगे और असली लड़ाई के लिए भारतीयों का प्रशिक्षण देकर इसका अवसर देंगे।

गाँधी जी को यही लगता था की 1906 का मसौदा अध्यादेश भारतीयों की स्थिति में किसी निवासी के नीचे वाले स्तर के समान लाने जैसा था।इस कारण गाँधी जी ने सत्याग्रह के बलबूते पर काफिर का उदाहरण देते हुए भारतीयों से अध्यादेश का विरोध करने का आग्रह किया।
गाँधी जी के शब्दों में ” यहाँ तक कि आधी जातियां और काफिर जो हमसे कम आधुनिक हैं ने भी सरकार का विरोध किया है। पास का नियम तो उन पर भी लागु होता है लकिन वे पास भी नहीं दिखाते है “।

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के लिए संघर्ष (1916-1945) (Struggle for Indian freedom struggle)-

गाँधी जी 1915 में दक्षिण अफ्रीका से भारत में लोट आए उन्होंने भारतीय राष्ट्रिय काँग्रेस (indian national congress) के अधिवेशनो पर अनेक विचार व्यक्त किये अपने अंहिसावादी विचार और सत्याग्रह के बलबूते पर उन्होंने भारत को स्वतंत्रता दिलाने के लिए
उन्होंने बहुत सारे आन्दोलन चलाये जो निम्नलिखित है –

  • 1. चंपारण और खेड़ा सत्याग्रह (1918 )-

भारत लौटने के बाद गाँधी जी स्वतंत्रता संग्राम में शामिल हो गए| गांधीजी को लोकप्रियता चंपारण और खेडा सत्याग्रह आन्दोलन में मिली| चपारण में ब्रिटिश ज़मींदार किसानों को खाद्य फसलों की बजाए नील की खेती करने के लिए मजबूर करते थे और सस्ते मूल्य पर फसल खरीदते थे ।  जिससे किसानो की स्थिति एकदम खराब हो गयी इस कारण किसानो में अत्यधिक गरीबी छा गयी और आकाल पड़ने लगे ।

अंग्रेजो ने किसानो पर अनेक प्रकार के कर लगा दिए जिनके बोझ से किसान दबते चले गये यह स्थिति बहुत निराशाजनक थी। महात्मा गाँधी ने अप्रैल 1917 में राजकुमार शुक्ला के निमंत्रण पर बिहार के चम्पारन के नील कृषको की स्थिति का जायजा लेने वहाँ पहुँचे।वंहा पर हजारो की संख्या में जनता गाँधी जी का दर्शन करने के लिए उमड़ पड़ी ।

गांधी जी ने जमींदारों के खिलाफ़ विरोध प्रदर्शन और हड़तालों का नेतृत्व किया जिसके बाद गरीब और किसानों की मांगों को माना गया।
सन 1918 में गुजरात राज्य में स्थित खेड़ा बाढ़ और सूखे की चपेट में आ गया था जिसके कारण किसान और गरीबों की स्थिति बद्तर हो गयी और लोग ऋण माफ़ी की मांग करने लगे खेड़ा में गाँधी जी के मार्गदर्शन में सरदार पटेल ने अंग्रेजों के साथ इस समस्या पर विचार विमर्श के लिए किसानों का नेतृत्व किया। इस प्रकार चंपारण और खेड़ा के बाद गांधी की ख्याति देश भर में फैल गई और वह स्वतंत्रता आन्दोलन के एक महत्वपूर्ण नेता बनकर उभरे।

  • 2.खिलाफत आन्दोलन (Khilafat movement)-

यह आन्दोलन (1919-1922) भारत में मुख्यत: मुसलमानों द्वारा चलाया गया राजनीतिक-धार्मिक आन्दोलन था। कांग्रेस के अन्दर और मुस्लिमों के बीच अपनी लोकप्रियता बढ़ाने का मौका गाँधी जी को खिलाफत आन्दोलन के जरिये मिला। गाँधी जी ने इस आन्दोलन को हिन्दू तथा मुस्लिम एकता के लिय उपयुक्त समझा और मुस्लिमों के प्रति अपनी सहानुभूति प्रकट की।

Khilafat movement एक विश्वव्यापी आन्दोलन था जिसके द्वारा खलीफा के गिरते प्रभुत्व का विरोध सारी दुनिया के मुसलमानों द्वारा किया जा रहा था।प्रथम विश्व युद्ध में पराजित होने के बाद ओटोमन साम्राज्य विखंडित कर दिया गया था जिसके कारण मुसलमानों को अपने धर्म और धार्मिक स्थलों के सुरक्षा को लेकर चिंता बनी हुई थी।

भारत में खिलाफत का नेतृत्व‘आल इंडिया मुस्लिम कांफ्रेंस’ द्वारा किया जा रहा था।धीरे-धीरे गाँधी इसके मुख्य प्रवक्ता बन
भारतीय मुसलमानों के साथ एकजुटता व्यक्त करने के लिए उन्होंने अंग्रेजों द्वारा दिए सम्मान और मैडल वापस कर दिया। इसके बाद गाँधी न सिर्फ कांग्रेस बल्कि देश के एकमात्र ऐसे नेता बन गए जिसका प्रभाव विभिन्न समुदायों के लोगों पर था।

इस आन्दोलन का उद्देश्य (सुन्नी) इस्लाम के मुखिया माने जाने वाले तुर्की के खलीफा के पद की पुन:स्थापना कराने केलिये अंग्रेजों पर दबाव बनाना था। सन्1924 में मुस्तफ़ा कमाल के ख़लीफ़ा पद को समाप्त किये जाने के बाद यह अपने-आप समाप्त हो गया। लेकिन इसकी वजह से भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और आजकल की भारतीय राजनीति में एक बहस का मुद्दा छिड़ गया।इसके मुख्य प्रणेता उत्तर प्रदेश के अली बंधुओं को पाकिस्तान में बहुत आदर से देखा जाता है।

  • 3.असहयोग आन्दोलन (non cooperation movement)-

असहयोग आन्दोलन गांधी जी ने 1 अगस्त, 1920 को आरम्भ किया। गाँधी जी का मानना था की भारत में अंग्रेजी हुकुमत भारतीयों के सहयोग से ही संभव हो पाई थी और अगर हम सब मिलकर अंग्रेजों के खिलाफ हर बात पर असहयोग करें तो आजादी संभव है।
गांधी जी ने असहयोग, अहिंसा तथा शांतिपूर्ण प्रतिकार को अंग्रेजों के खिलाफ़ शस्त्र के रूप में उपयोग किया। आन्दोलन के उद्देश्य के सम्बंध में गाँधी जी ने कहा था कि, हमारा उद्देश्य है स्वराज्य। यदि संभव हो, तो ब्रिटिश साम्राज्य के अंर्तगत और यदि आवश्यक हो तो
ब्रिटिश साम्राज्य के बाहर।

असहयोग आन्दोलन प्रथम राष्ट्रव्यापी आन्दोलन था हालाँकि प्रथम विश्व युद्ध में गाँधी जी ने ब्रिटिश सरकार का सहयोग करने की अपील जनता से की थी दरअसल ब्रिटिश वादों के अनुसार गाँधी जी एवं जनता को ये विश्वास था कि प्रथम विश्व युद्ध के बाद भारत में लोकतंत्र कायम होगा किन्तु ऐसा नही हुआ। जिसकी वजह से गाँधी जी को सहयोग के स्थान पर असहयोग का मार्ग अपनाना पङा। जिसमें समस्त भारत की जनता ने उत्साह से भाग लिया था।

मुस्लिम लीग का खिलाफत आन्दोलन भी असहयोग आन्दोलन के साथ था।जलियावाला बागकांड तथा हंटर समिति की रिपोर्ट ने असहयोग आन्दोलन में आग में घी का काम किया असहयोग आन्दोलन के और भी अन्य कारण थे। जैसे कि, माण्टफोर्ड सुधार
घोषणाओं ने स्वराज के वचन को तोङ दिया। ये भारतीयों को अपमानजनक लगा। बाल गंगाधर तिलक  ने कहा था कि, हमें बिना सूर्य का सवेरा दिया गया है।युद्धकाल में अत्यधिक खर्च से भारत की आर्थिक दशा कमजोर हो गई थी, फिर भी अंग्रेजों ने भारतीयों का आर्थिक शोषण किया।

1918 के रोलेट एक्ट के नियम भी इस आन्दोलन का कारण बनें। रोलेट एक्ट को भारतीयों ने काले कानून की संज्ञा दी थी। दिसम्बर 1921 में गांधी जो भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का कार्यकारी अधिकारी नियुक्त किया गया। उनके नेतृत्व में कांग्रेस को स्वराज के नाम वाले एक नए उद्देश्‍य के साथ संगठित किया गया।

गांधी जी ने स्वतंत्रता आंदोलन को सहयोग देने के लिए पुरूषों और महिलाओं को प्रतिदिन खादी के लिए सूत कातने में समय बिताने के लिए कहा।गांधी जी ने ब्रिटेन की शैक्षिक संस्थाओं तथा अदालतों का बहिष्कार और सरकारी नौकरियों को छोड़ने का तथा सरकार से प्राप्त तमगों और सम्मान (honours) को वापस लौटाने का भी अनुरोध किया।

असहयोग को दूर-दूर से अपील और सफलता मिली जिससे समाज के सभी वर्गों की जनता में जोश और भागीदारी बढ गई।गाँधी जी ने कहा था कि, आन्दोलन पूरी तरह अहिंसक होना चाहिये फिर जैसे ही यह आंदोलन अपने शीर्ष पर पहुंचा वैसे फरवरी 1922 में चौरी-चौरा काण्ड की वजह से असहयोग आन्दोलन को स्थगित करना पङा गाँधी जी को गिरफ्तार कर लिया गया 20 मार्च 1922 को राजद्रोह के लिए गाँधी जी पर मुकदमा चला जिसमे उन्हें छह साल की सजा सुनाई गयी और उन्हें जेल भेज दिया गया 28 मार्च 1922 से लेकर उन्होंने केवल 2 साल ही जैल में बिताए थे कि उन्हें फरवरी 1924 में आंतों के ऑपरेशन के लिए रिहा कर दिया गया।

वास्तविकता में असहयोग आन्दोलन जितने दिन भी चला उसने ब्रिट्रिश साम्राज्य की नींव हिला दी थी। नेहरु जी ने इस आन्दोलन के उत्साह पर कहा था कि, जेल भर गई थी। वातावरण में बिजली भरी हुई थी और चारो ओर गङगङाहट हो रही थी, ऐसा जान पङ रहा था कि, अन्दर ही अन्दर क्रान्ति हो रही है।

इस आन्दोलन ने ब्रिटिश साम्राज्य की जङों पर प्रहार किया था। श्री चिमनलाल सितलवाड के अनुसार, वायसराय लार्ड राडिंग कुर्सी पर हताश बैठ गया था और अपने दोनों हाँथों से सिर थामकर फूट पङा था। असहयोग आन्दोलन के दौरान भारत में राष्ट्रीय एकता का अद्भुत वातावरण बना था। सचमुच,असहयोग आन्दोलन एक अद्भुत और अनोखा आन्दोलन था।

  • 4.स्वराज और नमक सत्याग्रह (Swaraj and Salt Satyagraha) –

असहयोग आन्दोलन के दौरान गिरफ़्तारी के बाद गांधी जी फरवरी 1924 में रिहा हुए और सन 1928 तक सक्रिय राजनीति से दूर ही रहे। इस दोरान गाँधी जी स्वराज पार्टी और इंडियन नेशनल कांग्रेस के बीच खाई को भरने में लगे रहे और इसके अतिरिक्त वे अस्पृश्यता, शराब,
अज्ञानता और गरीबी के खिलाफ आंदोलन छेड़ते भी रहे।

अंग्रेजी सरकार ने सर जॉन साइमन के नेतृत्व में एक नया संवेधानिक सुधार आयोग बनाया जिसमें एक भी सदस्य भारतीय नहीं था इसका परिणाम भारतीय राजनैतिक दलों द्वारा बहिष्कार निकला गांधी जी ने न केवल युवा वर्ग सुभाष चंद्र बोस तथा जवाहरलाल नेहरू जैसे पुरूषों द्वारा तत्काल आजादी की मांग के विचारों को फलीभूत किया बल्कि अपनी स्वयं की मांग को दो साल की बजाए एक साल के लिए रोक दिया।

अंग्रेजों के द्वारा कोई जवाब न मिलने पर 31 दिसंबर , 1929 को लाहौर में भारत का झंडा फहराया गया 26 जनवरी 1930 का दिन लाहौर में भारतीय स्वतंत्रता दिवस के रूप में इंडियन नेशनल कांग्रेस ने मनाया। स्वराज शब्द का अर्थ होता है अपना राज्य , स्वराज्य आन्दोलन को चलाने का उद्देश्य था स्वाधीनता प्राप्त करना।

कुछ लोगों ने पूर्ण स्वाधीनता को दुलर्भ मानते हुए अच्छी सरकार को वरीयता दी लेकिन गाँधी जी के अनुसार स्वराज्य का अर्थ जन प्रतिनिधियां द्वारा संचालित एक ऐसी व्यवस्था से था जो आम आदमी की अपेक्षाओं और जरूरतों के अनुकूल हो।

नमक सत्याग्रह गाँधी जी के द्वारा चलाया गया एक बहुत ही महत्वपूर्ण सत्याग्रह था गांधी जी ने मार्च 1930 में नमक पर कर लगाए जाने के विरोध में नया सत्याग्रह चलाया जिसके अंतर्गत उन्होंने 12 मार्च से 6 अप्रैल तक अहमदाबाद से दांडी , गुजरात तक लगभग 388
किलोमीटर की यात्रा की। इस यात्रा का उद्देश्य खुद नमक उत्पन्न करना था समुद्र की ओर इस यात्रा में हजारों की संख्‍या में भारतीयों ने भाग लिया। भारत में अंग्रेजों की पकड़ को विचलित करने वाला यह एक सर्वाधिक सफल आंदोलन था । जिसमें अंग्रेजों ने 80,000 से अधिक लोगों को जेल भेजा

  • 5.हरिजन आंदोलन (Harijan movement) –

भारतवर्ष में वर्णव्यवस्था के विकृत हो आने से जाति-पाति का भेदभाव अपने चरम सीमा पर पहुंच चूका था महात्मा गाँधी ने “हरिजन” शब्द का प्रयोग हिन्दू समाज के उन समुदायों के लिये करना शुरु किया था जो सामाजिक रूप से बहिष्कृत माने जाते थे। इनके साथ ऊँची जाति के लोग छुआछूत का व्यवहार करते थे अर्थात उन्हें अछूत समझा जाता था।

यह देखकर कि दलित नाम ही अपमानजनक लगने लगा है गुजरात के एक दलित ने महात्मा गाँधी जी से दलितों के लिए हरिजन नाम का सुझाव दिया। गाँधी जी को यह नाम पसंद आया था और बाद में उन्होंने “हरिजन” नाम से एक समाचार-पत्र भी निकाला हालाँकि हरिजनों ने गाँधी जी की अपेक्षा डॉ बी.आर.अम्बेडकर को अपना नेता चुना था ।

परन्तु गाँधी जी के द्वारा चलाये गये आंदोलनों ने हरिजनों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और दलितों के नेता डी.बी.आर.अम्बेडकर की कोशिशो के फलस्वरूप अंग्रेज सरकार ने अछूतों के लिए एक नए संविधान के अंतर्गत पृथक निर्वाचन मंजूर कर दिया था।
लेकिन अब हरिजन शब्द को प्रतिबन्धित कर दिया गया है ! हरिजन शब्द के स्थान पर अनुसूचित जाति का इस्तेमाल करना अनिवार्य कर दिया गया है !

  • 6.भारत छोड़ो आंदोलन (Quit India Movement In Hindi) –

भारत छोड़ो आन्दोलन की शुरुआत महात्मा गाँधी जी ने अगस्त 1942 में की थी । यह एक आन्दोलन था जिसका लक्ष्य भारत से ब्रिटिश साम्राज्य को समाप्त करना था। इस आन्दोलन का संचालन सही तरीके से नही किया गया था जिससे यह आन्दोलन जल्द ही धराशायी हो गया ।

यह आन्दोलन स्वतंत्रता संघर्ष का सर्वाधिक शक्तिशाली आन्दोलन बन गया और इस आन्दोलन में व्यापक हिंसा और गिरफ्तारी हुई। गाँधी जी ने इसी आन्दोलन में करो या मरो का नारा दिया था इस संघर्ष में हजारों स्वतंत्रता सेनानियों या तो मारे गए या घायल हो
गए और हजारों को गिरफ्तार भी कर लिया गया।

गांधी और उनके समर्थकों ने स्पष्ट कर दिया कि वह युद्ध के प्रयासों का समर्थन तब तक नहीं देंगे तब तक भारत को तत्‍काल आजादी न दे दी जाए। गाँधी जी ने यह भी कह दिया था कि व्यक्तिगत हिंसा के बावजूद यह आन्दोलन बंद नहीं होगा उन्होंने कहा कि उनके चारों ओर अराजकता का आदेश असली अराजकता से भी बुरा है। जैसा सबका अनुमान था अंग्रेजी सरकार ने गाँधी जी और कांग्रेस कार्यकारणी समिति के सभी सदस्यों को मुम्बई में 9 अगस्त , 1942 को गिरफ्तार कर लिया और गांधी जी को पुणे के आंगा खां महल में दो साल तक बंदी बनाकर रखा गया।

यही वह समय था जब गांधी जी को उनके निजी जीवन में दो गहरे आघात लगे।और गांधी जी के 28 महीने जेल में रहने के बाद 22 फरवरी 1944 को उनकी पत्नी कस्तूरबा गांधी का देहांत हो गया।

इसके छ: सप्ताह बाद गांधी जी को भी मलेरिया का भयंकर शिकार होना पड़ा।अंग्रेज गाँधी जी को इस हालत में जेल में नहीं छोड़ सकते थे इसलिए आवश्यक उपचार के लिए 6 मई 1944 को गाँधी जी को रिहा कर दिया गया। हालांकि भारत छोड़ो आंदोलन को अपने
उद्देश्य में आशिंक सफलता ही मिली लेकिन आंदोलन के निष्‍ठुर दमन ने भारत को संगठित कर दिया।और द्वितीय विश्व युद्ध के अंत तक ब्रिटिश सरकार ने स्पष्ट कर दिया कि बहुत जल्द भारत की सत्ता भारतीयों के हाथों में सौंप दी जाएगी।

गाँधी जी ने भारत छोड़ो आन्दोलन समाप्त कर दिया और सरकार ने लगभग 1 लाख राजनैतिक कैदियों को रिहा कर दिया।देश का विभाजन और आजादी : द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त होते-होते ब्रिटिश सरकार ने देश को आजाद करने का संकेत दे दिया था।

 

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Mahatma Gandhi Book’s माय एक्सपेरिमेंट वुईथ ट्रुथ (My Experiment With Truth).

महात्मा गाँधी की हत्या (Mahatma Gandhi’s assassination)-

30 जनवरी , 1948 को राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की उस समय नाथूराम गोडसे द्वारा दिल्ली के बिरला हाउस में शाम के समय गोली मारकर हत्या कर दी गई जब गाँधी जी एक प्रार्थना सभा को संबोधित करने जा रहे थे तब नाथूराम गोडसे ने उनके सीने में तीन गोलियां दाग दीं।
राज घाट, नई दिल्ली में गांधी जी के स्मारक पर “देवनागरी में हे राम ” लिखा हुआ है। ऐसा व्यापक तौर पर माना जाता है कि जब गांधी जी को गोली मारी गई तब उनके मुख से निकलने वाले ये अंतिम शब्द थे। हालांकि इस कथन पर विवाद उठ खड़े हुए हैं। गोड़से और उसके उनके सह षड्यंत्रकारी नारायण आप्टे को बाद में केस चलाकर सजा दी गई तथा 25 नवंबर 1949 को इन्हें फांसी दे दी गई।

भारत के स्वतंत्रता नायक( Freedom Hero)महात्मा गाँधी की मृत्यु पर पूरे देश ने शोक मनाया था। गाँधी जी एक ऐसे महान नेता थे जो बिना किसी अस्त्र-शस्त्र के ही अंग्रेज सरकार को देश से बाहर निकालने में सफल हुए थे। गाँधी जी ने अपना पूरा जीवन देश के कल्याण के लिए समर्पित कर दिया। अपने कार्यों , विचारों एवं अनुशासन के कारण से उनका जीवन पूरे संसार के लिए प्रेरणा(Inspiration)का श्रोत है।

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